"शाखा और सुमन"
By-Mohd.Rizwan
मैं शाखा हूं सुमन तुम हो जरा अहसास तो कर लो
मोहब्बत तुमसे करते हैं यह दूरी पास तो कर लो
के पागल हो गया है यह दीवाना प्यार में तेरे
दो पल सीता बनकर संग में वनवास तो कर लो
कि मैं यह कह नहीं सकता तेरी हर बात नाजुक है
मगर विश्वास है मेरा तेरे जज्बात नाजुक हैं
के हंस कर दे दिया होता दिया मैं तेरे हाथों में
मुझे मालूम था लेकिन तेरे वह हाथ नाजुक हैं
रो रो कर किसी गम में सुबह से शाम मत करना
अनजानी बाहों में खुद को कभी नाकाम मत करना
मेरी बातों से तुम को गर चिढ़न होती है तो सुन लो
के कत्लेआम कर देना मगर बदनाम मत करना
प्रेमी भाव है मुझ में करूं इनको तरोताजा
आंखें मूंदकर खोलूं मोहब्बत का मैं दरवाजा
तेरा आशिक नहीं मर्दानगी का खुला रुस्तम
के मजनू है खड़ा इस ओर लैला बन के तू आजा